स्वातंत्र्यप्राप्ती में गांधीजी और क्रांतिकारकों का समान योगदान

आझादी नहीं मिलती "चरखा" चलाने से...

क्या हमें आझादी भगतसिंग, सुखदेव, राजगुरु (और बाकी सशत्र क्रांतिकारी - नेताजी, आझाद इ) की वजह से मिली --- हां
क्या हमें आझादी "सिर्फ" भगतसिंग, सुखदेव, राजगुरु (और बाकी सशत्र क्रांतिकारी - नेताजी, आझाद इ) की वजह से मिली --- बिलकुल नहीं

क्या हमें आझादी गांधीजी की वजह से मिली --- हां
क्या हमें आझादी "सिर्फ" गांधीजी की वजह से मिली --- बिलकुल नहीं

हमें आझादी मिली "सशस्त्र बगावत" की डर की वजह से। कोई भी निष्पक्षपाती इतिहासतज्ञ यह बात मानेगा। सवाल ये है की - क्या सशत्र बगावत की संभावना निर्माण होने में गांधीजी का कोई अप्रत्यक्ष सहभाग नहीं था? क्या सम्पूर्ण देश में देशभक्ती की लहर दौड़ाने में गांधीजी अग्रक्रमी नहीं थे? शांतिपूर्ण तरीकेसे इतिहास समझनेसे ही हमें कुछ निष्कर्ष निकालने चाहिये।

कॉंग्रेस की स्यूडो-सेक्युलरिझम के परिणाम इस साल के शहीद दिवस - २३ मार्च - पर मुझे फेसबुक पर हर तरफ दिखाई दे रहे थे। और दुःख की बात यह है की भड़के हुए माथों को शांत करने का प्रयास कोई नहीं कर रहा था। ईट का जवाब पत्थर से - यह एक भारत माँ सपूत दूसरे सपूत से, एक भाई दूसरे भाई से कह रहा था।

५-६ दशकोंसे कॉंग्रेस ने, खुदको गांधीवादी कहलाने वालो ने और बिकी हुई मिडीया ने, गांधीजी के नाम को इतना गलत सलत इस्तेमाल किया है, की गांधीजी की सही सही पहचान नामुमकिन सी हो गई है। सहीं मायने में हमारी आझादी और उसके पश्चात "भारत" नामके देश का संवैधानिक जन्म - इस सबमे गांधीजी का योगदान अनोखा है। लेकिन दुर्भाग्य की बात है, खुदको गांधीवादी कहलाने वाले भी यह बात छुपाके रखते है।

ज़रा सोचिये - १८५७ की बगावत में क्या हुआ था। गांधीजी जब भारत में लौटे तब भारत की स्थिती क्या थी, भारतवासी कौनसी समस्यांओंसे लड़ रहे थे।

भारत भ्रमण पश्चात, भारत को "नजदीक से जानने" के बाद गांधीजी ने कॉंग्रेस सम्मेलन में जो सबसे पहला भाषण दिया उसमे उन्होंने कहा - "हम, कुछ पढ़े लिखे लोग यहाँ आझादी की मांग कर रहे है। और वहा अधिकतर भारतीय, गरीबी, भुखमरी, सुखा इन समस्यांओंसे जूझ रहा है। जब तक हम  समस्याओंपे समाधान नहीं निकालते तब तक  स्वातंत्र्य की दुहाई करना गलत होगा।"

यहाँ गांधीजी ने बड़ी स्पष्टता से ३ बातें कहीं -

१) अगर हम हमारी जनता को, नए स्वतंत्र भारत में कोई नयी राजनैतिक व्यवस्था, कोई जनहितार्थ व्यवस्था पाने का विश्वास नहीं दिला पाते है, तो अधिकतर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा नहीं लेंगे। एक गुलामी जाके दूसरी आएगी - तो वो लोग हिस्सा क्यों लें?

२) इस लिए - हमें "स्वातंत्र्य" का मतलब समझना और समझाना होगा । स्वातंत्र्य के बाद क्या? कौनसी राजनैतिक व्यवस्था, कौनसे हक, कौनसे कानून - इन सभी मुद्दोंपे सोच विचार कर, सामान्य स्तर पर एकमत बनाना होगा।

३) नए व्यवस्था के बारे में आश्वस्त करा देने से काम नहीं चलेगा। जब तक "हम सब भारतीय एक है" यह भावना जागृत नहीं होगी, तब तक पूरा भारत वर्ष एक साथ लड़ने के लिए तैयार नहीं होगा।

गांधीजी ने बड़ी चतुरता से कभीभी अंग्रेजों से खुला पंगा नहीं लिया। क्यूंकि उन्हें पता था -  वह ऐसा करेंगे तो उनके पूरे किये पे पानी फिर जाएगा - उन्हें और उनके साथियोंको पकड़के कैद करा दिया जाएगा, फांसी दी जाएगी।  जाहिर था, अंग्रेज अपनी हुकूमत के दुश्मनोंका बे हिचक सफाया करते थे।

इसी लिए, गांधीजी ने छोटे छोटे मुद्दोंपे लोगोंको एकजुट किया। लोगोंमें एकता की भावना जगाई। प्रार्थना, अनशन, सत्याग्रह - ये सब तो बस निमित्त मात्र थे, लोगोंको इकठ्ठा करके देशप्रेम जगाने के। और इन सबमे गांधीजी कभीभी अंग्रेजोंके खिलाफ बोलते नहीं थे - इसलिए अंग्रेजोंके पास गांधीजी के खिलाफ कोई सबूत नही था, की उन्हें पकड़े और इन सब गतिविधियों पे रोक लगा सकें ।

इस सब के साथ साथ - आझादी के बाद क्या ? -  देशभर के समझदार लोगोंके साथ मिलकर इस सवाल का जवाब ढूंढनेका काम गांधीजी ने ही कॉंग्रेस से करवाया। Capitalism, socialism, communism ऐसे अनेक विचारधाराओंको समेट कर सबका अच्छा अच्छा जोड़कर हमारी व्यवस्था निर्माण हुई।  जाहिर है उसमे बहोत सारे दोष है, और उन्हें हमें मिटाना है । लेकिन ७० साल पेहले हमने बहुत अच्छी व्यवस्था पाई।

सब नागरिकोंको समान हक - अशिक्षित लोग, स्त्रियां, निचली जाती के लोग - सभी को पढ़ने का हक, चुनाव का हक, कोई भी नौकरी/रोजगार करने का हक --- यह सब चीजें आज हमें सहज लगती हैं। लेकिन ७० साल पहले परिस्थिती काफी अलग थी। यह सब हो पाया - ये सब होने में गांधीजी का योगदान हम अनदेखा नहीं कर सकते ।

कहां जा रहा है की - चरखे से आझादी नहीं मिली। ये कहने वाले चरखे का मूल हेतु नहीं जान पा रहे है इस लिए ऐसा कह रहे है। चरखा हमारे गरीब भारतीय हाथोंको रोजगार देनेका एक माध्यम था। और इसका एक और बड़ा लाभ था - अंग्रेजोंकी कपडोंकी मिलें, जो हमें कपड़ा बेच के पैसा कमाती थी - उनकी आर्थिक कमर चरखे ने तोड़ दी !

भाईयो - चरखा चलाने का हेतु स्वातंत्र्य प्राप्ती था ही नहीं , हमारे हाथोंको रोजगार दिलाना और अंग्रेजोंके कपडा उद्योग की कमर तोडना ये था --- तो फिर हल्ला क्यों ?

अर्थात - जैसा मैंने उपर कहा, इस गुस्से का होना जायज़ है। कॉंग्रेस ने सालोंसाल गांधीजी के नाम पे की हुई गंदी राजनीति और सभी क्रांतिकारियोंका अपमान हमें गांधीजी के प्रति गुस्सा दिलाता है। बस अब ये रोकना चाहिए। हमें ये समझना चाहिए की ये कॉंग्रेस की करतूत है, इसमें गांधीजी का दोष नहीं।

दुर्भाग्य की बात है, हमारे  देश में "इतिहास से सीख ले के आगे बढ़ना" थम सा गया है । हम इतिहास की चर्चाओं मे फस चुके है । और चलाख politicians हमें इन्ही चर्चाओंमे व्याप्त रखते है जिससे की हमें "आज"की समस्याओंपे ध्यान देनेका अवसर ही नहीं मिल पाता !

हमें इस जाल से निकलना होगा ।

इतिहास में ही फंसे रहोगे, तो वर्तमान में सुधार करके भविष्य कब लिखोगे?

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